मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 31
निःश्वासेनाधरकिसलयक्लेशिना विक्षिपन्तीं शुद्धस्नानात्परुषमलर्क नूनमागण्डलम्बम् । मत्संभोगः कथमुपनमेत्स्वप्नजोऽपीति निद्रामाकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥
साधारण (तेल आदि से रहित) स्नान से रूखे, निश्चय ही कपोलों तक लटकने वाले बालों की किसलय के समान निचले ओठ को पीड़ित (तपाने वाले) कर देने वाले लम्बे साँस से हिलाती हुई, (तथा) स्वप्न में उत्पन्न भी मेरा संभोग किसी प्रकार प्राप्त हो जाये - इस प्रकार आँखों के पानी के प्रवाह से रोके गये स्थान वाली निद्रा की इच्छा करती हुई (उस पतिव्रता को देखना)।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मेघदूतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मेघदूतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें