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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 37
तस्मिन्काले जलद यदि सा लब्धनिद्रासुखा स्यादन्वास्यैनां स्तनितविमुखो याममात्रं सहस्व । मा भूदस्याः प्रणयिनि मयि स्वप्नलब्धे कथञ्चित्सद्यः कण्ठच्युतभुजलताग्रन्थि गाढोपगूढम् ॥
हे मेघ! उस समय (तुम्हारे उसके पास पहुँचने के समय) यदि वह (प्रिया) निद्रा का सुख प्राप्त कर रही हो तो उसके पास बैठकर गर्जन से विमुख होकर प्रहर भर तक प्रतीक्षा करना। (ताकि) इस (प्रिया) का मुझ प्रिय के किसी प्रकार स्वप्न में मिलने पर (किया गया) गाढ़ आलिङ्गन शीघ्र ही कण्ठ से शिथिल हुए लता-जैसी भुजाओं के वन्धन वाला न हो जाये।
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