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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 44
श्यामास्वङ्गं चकितहरिणीप्रेक्षणे दृष्टिपातं वक्त्रच्छायां' शशिनि शिखिनां बर्हभारेषु केशान् । उत्पश्यामि प्रतनुषु नदीवीचिषु भूविलासान् हन्तैकस्मिन् क्वचिदपि न ते चण्डि सादृश्यमस्ति ॥
प्रियङ्गगु लताओं में (तेरे) शरीर की, भयभीत हुई हरिणियों की चितवन में (तेरे) मुख की कान्ति की, मयूरों के पयों के समूहों में (तेरे) केशों की (और) हल्की-हल्की नदियों की तरङ्गों में (तेरे) मुद्धों की कल्पना किया करता हूँ। खेद है कि हे कोप करने वाली! किसी भी एक (वस्तु) में तेरी समानता नहीं है।
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