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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 6
मन्दाकिन्याः सलिलशिशिरैः' सेव्यमाना मरुद्धिर्मन्दाराणामनुतटरुहर्हा छायया वारितोष्णाः । अन्वेष्टव्यैः कनकसिकतामुष्टिनिक्षेपगूढैः संक्रीडन्ते मणिभिरमरप्रार्थिता यत्र कन्याः ॥
जिस (अलकापुरी) में गङ्गा नदी के जल से शीतल पवनों द्वारा सेवा की जाती हुई, किनारों पर उगे हुए, मन्दार वृक्षों की छाया से रोकी गयी धूप वाली, देवताओं के द्वारा चाही जाने वाली, कन्याएँ सोने की बालू में मुट्ठी में रखकर छिपायी गयी, (अतएव) खोजी जाने वाली मणियों से खेलती हैं।
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