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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 39
भर्तुर्मित्रं प्रियमविधवे बिद्धि मामम्बुवाहं तत्संदेशैर्हृदयनिहितैरागतं त्वत्समीपम् । यो वृन्दानि त्वरयति पथि श्राम्यर्ता प्रोषितार्ना मन्द्रस्निग्यैर्ध्वनिभिरबलावेणिमोक्षोत्सुकानि ॥
हे सौभाग्यवति! मुझे (अपने) पति का प्रिय मित्र (और) हृदय में रखे हुए उसके संदेशों के साथ तेरे समीप आया हुआ मेघ जानो, जो (मेघ) (अपनी) गम्भीर और मधुर ध्वनियों से अबलाओं की चोटियों को खोलने को उत्सुक (तथा) मार्ग में थके हुए प्रवासियों के समूहों को (घर लौटने के लिये) प्रेरित करता है।
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