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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 23
तां जानीथाः परिमितकथां जीवितं में द्वितीयं दूरीभूते मयि सहचरे चक्रवाकीमिवैकाम् । गाढोत्कण्ठां गुरुषु दिवसेष्वेषु गच्छत्सु बाला जार्ता मन्ये शिशिरमथितां पद्मिनीं वाऽन्यरूपाम् ॥
मुझ साथी के दूर स्थित होने पर चकवी के समान अकेली, कम बोलने वाली उस (स्त्री) को मेरा दूसरा प्राण समझना। (विरह से) लम्बे इन दिनों के बीतने पर गाड़ी उत्कण्ठा वाली (उस) युवती को पाले से पीड़ित (मारी गयी) कमलिनी के समान अन्य रूप वाली हुई मानता हूँ।
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