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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 51
भूयश्चाह' त्वमपि शयने कण्ठलग्ना पुरा मे निद्रां गत्वा किमपि रुदती सस्वनं विप्रबुद्धा । सान्तर्हासं कथितमसकृत्पृच्छतश्च त्वया मे दृष्टः स्वप्नें कितव रमयन्कामपि त्वं मयेति ।॥
(तुम्हारे पति ने) फिर (आगे) कहा - पहले कभी शय्या पर मेरे गले लगी हुई तुम नींद में पड़कर किसी कारण जोर से रोती हुई जाग गयीं और तुमने बार-बार पूछने वाले मुझसे मन ही मन हँसी के साथ कहा था - हे धूर्त! मैंने स्वप्न में तुम्हें किसी (स्त्री) के साथ रमण करते देखा है।
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