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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 40
इत्याख्याते पवनतनयं मैथिलीवोन्मुखी सा त्वामुत्कण्ठोच्छ्वसितहदया वीक्ष्य संभाव्य चैवम् । श्रोष्यत्यस्मात्परमवहिता सौम्य सीमन्तिनीनां कान्तोदन्तः सङ्ग‌मात् सङ्गमात्किञ्चिदूनः ॥
इस प्रकार कहा जाने पर ऊपर की ओर मुख किये हुए (और) उत्कण्ठा से विकसित चित्त होकर, वह (मेरी प्रिया) पवन पुत्र (हनुमान्) को सीता के समान, तुम्हें देखकर और (तुम्हारा) आदर करके आगे सावधान होकर सुनेगी (क्योंकि) हे सौप्य! स्त्रियों को (पति के) मित्र द्वारा लाया गया पति का सन्देश मिलन से कुछ ही कम होता है।
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