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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 38
तामुत्थाप्य स्वजलकणिकाशीतलेनानिलेन प्रत्याश्वस्तां सममभिनवैर्जालकैर्मालतीनाम् । विद्युद्गर्भः स्तिमितनयनां त्वत्सनाथे गवाक्षे वक्तुं धीरः स्तनितवचनैर्मानिनीं प्रक्रमेथाः ॥
मध्य में बिजली वाले (और) धीर हुए (तुम) अपने जल की बूंदो से शीतल वायु द्वारा उस मनस्विनी को उठाकर चमेली की नयी कलियों के साथ आश्वस्त हुई तथा तुमसे युक्त झरोखे पर निश्चल दृष्टि लगायी हुई के साथ गर्जन रूपी वचनों से बोलना प्रारम्भ करना।
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