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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 10
अक्षय्यान्तर्भवननिधयः प्रत्यहं रक्तकण्ठरुगायन्द्भिर्धनपतियशः किन्नरैर्यत्र सार्थम् । वैवाजाख्यं विबुधवनितावारमुख्यासहाया बद्धालापा बहिरुपवनं कामिनो निर्विशन्ति ।।
जहाँ (अलकापुरी में) भवनों के अन्दर अपार निधियाँ रखने वाले, अप्सरा रूपी वेश्याओं को साथ लिये बातचीत करते हुए कामीजन प्रतिदिन मधुर स्वर वाले (और) कुबेर के यश को ऊँचे स्वर में गाने वाले किन्नरों के साथ वैवाज नाम वाले बाहरी उद्यान का उपभोग करते हैं।
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