पादानिन्दोरमृतशिशिराञ्जालमार्गप्रविष्टान्पूर्वप्रीत्या गतमभिमुखं' संनिवृत्तं तथैव ।
चक्षुः खेदात्सलिलगुरुभिः पक्ष्मभिश्छादयन्तीं साध्धेऽह्रीव स्थलकमलिनीं न प्रबुद्धां न सुप्ताम् ॥
झरोखों (खिड़कियों) के मार्ग से अन्दर प्रविष्ट हुई, अमृत के समान शीतल, चन्द्रमा की किरणों की ओर पूर्व स्नेह के कारण गयी हुई (लेकिन) तुरन्त ही लौटी हुई दृष्टि जो दुःख के कारण आँसुओं से भारी पलकों से ढकती हुई मेघों से आच्छन्न दिन में अविकसित (और) अमुकुनित स्थलकमलिनी (भूमि पर उत्पन्न होने वाली कमलिनी) के समान (स्थित) (उस पतिव्रता को देखना)।
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