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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 18
रक्ताशोकश्चलकिसलयः केसरश्चात्र कान्तः प्रत्यासन्नौ कुरबकवृतेर्माधवीमण्डपस्य । एकः सख्यास्तव सह मया वामपादाभिलाषी काङ्क्षत्यन्यो वदनमदिरां दोहदच्छद्मना ऽस्याः ॥
यहाँ (क्रीड़ाशैल पर) कुरवक की बाड़ वाले माधवी लता के कुञ्ज के अत्यन्त पास में हिलते हुए नवीन कोपलों वाला अशोक एवं सुन्दर बकुल (मौलसरी) का वृक्ष है, (उनमें से) एक मेरे साथ तुम्हारी सखी के (भाभी के) बायें पैर (के प्रहार) का इच्छुक है (और) दूसरा (बकुल का वृक्ष) दोहद के बहाने से उसके मुख की मदिरा को चाहता है।
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