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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 47
भित्वा सद्यः किसलयपुटान्देवदारुडुमाणां ये तत्क्षीरसुतिसुरभयो दक्षिणेन प्रवृत्ताः । आलिङ्ग्यन्ते गुणवति मया ते तुषाराद्रिवाताः पूर्वं स्पृष्टं यदि किल भवेदङ्गमेभिस्तवेति ॥
हे गुणशालिनि, देवदारु वृक्षों की कोपलों की परतों को शीघ्र ही भेदकर उनके दूध के स्राव से सुगन्धित जो (पवन) दक्षिण दिशा की ओर चलते हैं, मैं उन हिमालय पर्वत के पवनों का "इन्होंने सम्भवतः तेरे शरीर का पहले स्पर्श किया होगा" ऐसा सोचकर आलिङ्गन करता रहता हूँ।
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