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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 14
मत्वा देवं धनपतिसखं यत्र साक्षाद् वसन्तं प्रायश्चापं न वहति भयान्मन्मथः षट्पदज्यम् । सधूभङ्गप्रहितत्तयनैः' कामिलक्ष्येष्वमोघेस्तस्यारम्भश्चतुरवनिताविश्वमैरेव' सिद्धः ।।
जहाँ (भलका में) कामदेव कुबेर के मित्र महादेव शिव को प्रत्यक्ष रूप से रहता हुआ जानकर भय के कारण भ्रमर रूपी डोरी वाले धनुष को धारण नहीं करता, (क्योंकि) उसका कार्य टेढ़ी भौंह करके चलाये गये नेत्रों वाले, कामुकञ्जन रूपी निशानों पर, सफल चतुर स्त्रियों के हाव-भाव से ही बन जाता है।
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