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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 27
शेषान्मासान्विरहदिवसस्थापितस्यावधेर्वा विंन्यस्यन्ती भुवि गणनया देहलीदत्तपुष्यैः । संभोगं वा हृदयनिहितारम्भमास्वादयन्ती प्रायेणैते रमणविरहेष्वङ्गनानां विनोदाः ॥
अथवा विरह के दिनों से निश्चित की हुई (शाप की) अवधि के शेष रहे महीनों को देहली पर रखे गए पुष्यों के द्वारा गिनने से पृथ्वी पर रखती हुई अथवा मन में कल्पना के द्वारा आरम्भ किये गये संभोग का आस्वादन करती हुई (वह मेरी प्रिया तेरी दृष्टि में शीघ्र पड़ेगी)। प्रिय स्त्रियों के प्रियतमों के वियोग के दिनों में (ये) ही मन बहलाने के उपाय होते हैं।
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