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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 42
अङ्गेनाई प्रतनु तनुना गाढतप्तेन तप्तं सास्त्रेणाश्रूद्भुतमविरतोत्कण्ठमुत्कण्ठितेन । उष्णोच्छ्‌वार्स समधिकतरोच्छ्‌वासिना दूरवर्ती सङ्कल्पैस्तैर्विशति विधिना वैरिणा रुद्धमार्गः ॥
विपरीत भाग्य द्वारा रोके गये मार्ग वाला (और तुमसे) दूर रहने वाला, (तेरा पति) दुर्बल, अत्पन्त तपे हुए, आँसुओं से युक्त, उत्कण्ठित, लम्बे-लम्बे साँसों को लेने वाले शरीर से (तुम्हारे) अत्यधिक कृश, तपे हुए, बहुत आँसुओं से भरे हुए, निरन्तर उत्कण्ठित (और) गर्म साँसों वाले शरीर से उन-उन मनोरथों के साथ मिलता है।
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