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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 52
एतस्मान्मां कुशलिनमभिज्ञानदानाद्विदित्वा मा कौलीनादसितनयने मय्यविश्वासिनी भूः । स्नेहानाहुः किमपि विरहे ध्वंसिनस्ते त्वभोगादिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशीभवन्ति ॥
हे काले नेत्रों वाली! इस पहिचान के बताने से मुझे सकुशल जानकर लोकापवाद के कारण मेरे प्रति अविश्वासिनी न हो। (लोग) विरह में स्नेह भाव नष्ट हो जाते हैं, ऐसा व्यर्थ ही कहते हैं। ये (स्नेह भाव) तो भोगे न जाने के कारण प्रिय वस्तु के प्रति प्रेम रस के बढ़ जाने पर प्रेमपुञ्ज बन जाते हैं।
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