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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 28
सव्यापारामहनि न तथा पीडियेद्विप्रयोगः शङ्केरात्रौ गुरुतरशुचं निर्विनोदां सखीं ते। मत्संदेशैः सुखयितुमलं पश्य साध्वीं निशीथे तामुन्निद्रामवनिशयनां सौधवातायनस्तः ॥
दिन में काम में लगी हुई तेरी भाभी को (मेरा) वियोग उतना नहीं सताता होगा (परन्तु) रात में विनोद रहित (तेरी उस भाभी के) अधिक दुःखी होने की आशङ्का करता हूँ, (अतः) अर्द्धरात्रि में उचटी हुई नींद वाली पृथ्वी पर लेटी हुई पतिव्रता उसको मेरे सन्देशों के द्वारा अत्यधिक सुखी करने के लिये भवन के झरोखे में बैठकर देखना।
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