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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 24
नूनं तस्याः प्रबलरुदितोच्छूननेत्रं प्रियाया निःश्वासानामशिशिरतया भिन्नवर्णाधरोष्ठम् । हस्तन्यस्तं मुखमसकलव्यक्ति लम्बालकत्वादिन्दोर्दैन्यं' त्वदनुसरणक्लिष्टकान्तेर्विभर्ति ॥
अधिक रोने से सूजे हुए नेत्रों वाला, लम्बे-लम्बे साँसों की गर्मी से कान्तिहीन निचले ओठ वाला, हाथ पर रखा हुआ, लटकते हुए बालो के कारण सम्पूर्ण न दिखने वाला, उस (मेरी प्रिया) का मुख तुम्हारे आवरण से क्षीण कान्ति वाले चन्द्रमा की विवर्णता को निश्चित रूप से धारण कर रहा होगा।
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