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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 43
शब्दाख्येयं यदपि किल ते यः सखीनां पुरस्तात्कर्णे लोलः कथयितुमभूदाननस्पर्शलोभात् । सोऽतिक्रान्तः श्रवणविषयं लोचनाभ्यामदृश्यस्त्वामुत्कण्ठाविरचितपदं मन्मुखेनेदमाह ॥
जो (मेरा प्रिय) तेरी सखियों के सामने शब्दों से कहने योग्य भी जो (होता था), उसे सचमुच (तेरे) मुख के स्पर्श के लोभ से कान में कहने के लिए लालायित रहता था, कानों की पहुँच से बाहर हुआ (तथा) नेत्रों से न दिख पड़ने वाला यह (तेरा प्रिय) उत्सुकता से रचे गये शब्दों वाले इस (सन्देश) को मेरे मुख से तुमसे कहता है।
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