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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 8
नेत्रा नीताः सततगतिना यद्विमानाप्रभूमिरालेख्यानां सलिलकणिकादोषमुत्पाद्य' सद्यः । शङ्कास्पृष्टा इव जलमुचस्त्वादृशा जालमार्गेधूमोद्गारानुकृतिनिपुणाः जर्जरा निष्पतन्ति ॥
प्रेरक वायु द्वारा जिस (अलकापुरी) के सात मंजिलों वाले भवनों के ऊपर के भागों में ले जाये गये, चित्रों में जल कणों से दोष को उत्पन्न करके, शीघ्र ही भय से स्पर्श किये गये, मानो धुएँ के निकलने का अनुकरण करने में निपुण तुम्हारे जैसे मेघ छिन्न-भिन्न होकर खिड़कियों में से निकल जाते हैं।
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