एभिः साधो हृदयनिहितैर्लक्षणैर्लक्षयेथा द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शङ्खयद्मौ च दृष्ट्वा ।
क्षामच्छायं भवनमधुना मद्वियोगेन नूनं सूर्यापाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम् ॥
हे निपुण (सज्जन)! हृदय में रखे गये इन (पूर्व वर्णित) लक्षणों से (और) द्वार के पाशर्वो में चित्रित (बनाये गये) आकृति वाले शङ्ख और पद्म (नामक निधियों) को देखकर इस समय मेरे विरह से निश्चित ही क्षीण शोभा वाले (मेरे) भवन को पहिचान लोगे। (क्योंकि) सूर्य के चले जाने पर (अस्त हो जाने पर) कमल अपनी शोभा को पुष्ट (धारण) नहीं करता है।
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