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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 36
वामाश्चास्याः कररुहपदैर्मुच्यमानो मदीयैर्मुक्ताजालं चिरपरिचितं त्याजितो दैवगत्या । संभोगान्ते मम समुचितो हस्तसंवाहनानां यास्यत्यूरुः सरसकदलीस्तम्भगौरश्चलत्वम् ॥
मेरे नखों के चिह्नों से छोड़ी जाती हुई, दुर्भाग्यवश बहुत समय से जानी पहचानी मोतियों की लड़ी को छोड़ देने वाली, संभोग के अन्त में मेरे हाथों से दबाई जाने योग्य, सरस केले के तने के समान गौर वर्ण, इस (मेरी प्रिया) की बायीं जंघा फड़क उठेगी।
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