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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 53
आश्वास्यैवं प्रथमविरहोदप्रशोका सखीं ते शैलादाशु त्रिनयनवृषोत्खातकूटान्निवृत्तः । साभिज्ञानप्रहितकुशलैस्तद्वचोभिर्ममापि प्रातः कुन्दप्रसवशिथिलं जीवितं धारयेथाः ।।
प्रथम वियोग के कारण तीव्र दुःख वाली, अपनी सखी (भाभी) को पूर्वोक्त प्रकार से आश्वासन देकर तीन नेत्रों वाले (शिव) के बैल द्वारा उखाड़े गये शिखरों वाले, (कैलाश) पर्वत से शीघ्र (ही) लौटकर (तुम) पहिचान के साथ भेजे गये कुशल से युक्त उस (प्रिया) के वचनों से प्रातः कालीन कुन्द पुष्प के समान शिथिल हुए मेरे भी प्राणों को धारण कराना।
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