तन्मध्ये च स्फटिकफलका काञ्चनी वासयष्टिर्मूले बद्धा मणिभिरनतिप्रौढवंशप्रकाशैः ।
तालैः शिञ्जावलयसुभगैर्नर्तितः कान्तया मे यामध्णस्ते दिवसविगमे नीलकण्ठः सुहद्वः ।।
और उन (रक्ताशोक और बकुल) के बीच में नवीन बाँस के समान कान्ति वाली मणियों से जड़ में बँधी हुई एवं स्फटिक (बिल्लौर) मणि के फट्टे (तख्ते) वाली रहने की यष्टि (है)। मेरी प्रिया द्वारा झन-झन बजते हुए कङ्गनों से मनोहर तालियों से नचाया गया तुम्हारा मित्र मयूर दिन के बीतने पर जिस पर बैठा करता है।
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