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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 26
उत्सङ्गे वा मलिनवसने सौम्य निक्षिप्य वीणां मद्गोत्राङ्क विरचितपदं गेयमुद्गातुकामा' । तन्त्रीमाईं नयनसलिलैः सारयित्वा कथञ्चिद् भूयो भूयः स्वयमपि कृतां मूर्छनां विस्मरन्ती ॥
हे सौम्य! मैले वस्त्रों वाली गोद में वीणा को रखकर मेरे नाम के चिह्न वाले (तथा) रचे हुए पदों वाले गीत को उच्च स्वर में गाने की इच्छुक, आँसुओं से गीले हुए तार को किसी प्रकार पोंछकर बार-बार स्वयं बनायी गयी भी मूर्छना (स्वरों के चढ़ाव-उतार के क्रम) को भूलती हुई (तेरी दृष्टि में शीघ्र पड़ेगी)।
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