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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 49
नन्वात्मानं बहु विगणयन्नात्मनैवावलम्बे तत्कल्याणि त्वमपि नितरां मा गमः कातरत्वम् । कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥
हे प्रिय! बहुत विचार करता हुआ (मैं) अपने आप ही अपने को सहारा दिये रहता हूँ। हे सुभगे! इसलिए तुम भी बहुत अधिक व्याकुल मत होओ। अत्यन्त (लगातार) सुख अथवा लगातार दुःख किसे प्राप्त होता है? (लोगों की दशा) पहिये के अरे के क्रम से नीचे और ऊपर जाती रहती है।
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