मामाकाशप्रणिहितभुजं र्लब्यायास्ते कथमपि मया स्वप्नस॑दर्शनेषु ।
पश्यन्तीनां न खलु बहुशो न स्थलीदेवतानां मुक्तास्थूलास्तरुकिसलयेष्वश्रुलेशाः पतन्ति ॥
स्वप्न के ज्ञान में मेरे द्वारा किसी तरह (कठिनाई से) प्राप्त की गयी तेरे गाढ़ आलिङ्गन के लिए आकाश में भुजा फैलाये हुए, मुझे देखती हुई वन देवियों की मोतियों के समान मोटी आँसुओं की बूंदें वृक्षों की कोपलों पर बहुत बार न गिरती हों, ऐसी बात नहीं अर्थात् अवश्य गिरती हैं।
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