मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 46
मामाकाशप्रणिहितभुजं र्लब्यायास्ते कथमपि मया स्वप्नस॑दर्शनेषु । पश्यन्तीनां न खलु बहुशो न स्थलीदेवतानां मुक्तास्थूलास्तरुकिसलयेष्वश्रुलेशाः पतन्ति ॥
स्वप्न के ज्ञान में मेरे द्वारा किसी तरह (कठिनाई से) प्राप्त की गयी तेरे गाढ़ आलिङ्गन के लिए आकाश में भुजा फैलाये हुए, मुझे देखती हुई वन देवियों की मोतियों के समान मोटी आँसुओं की बूंदें वृक्षों की कोपलों पर बहुत बार न गिरती हों, ऐसी बात नहीं अर्थात् अवश्य गिरती हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मेघदूतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मेघदूतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें