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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 50
शापान्तो मे भुजगशयनादुत्थिते शार्ङ्गपाणौ 'शेषान्मासान्गमय चतुरो लोचने मीलयित्वा । पश्चादाां विरहगणितं तं तमात्माभिलाषं निर्वेक्ष्यावः परिणतशरच्चन्द्रिकासु क्षपासु ॥
भगवान् विष्णु के शेषनागरूपी शय्या से उठ जाने पर मेरे शाप का अन्त (होगा) (इसलिए) तू शेष चार महीने आँख मींधकर बिता ले। फिर हम दोनों विरह में विचारी गयी उन-उन अपनी इच्छाओं को ढली हुई शरद् ऋतु की चाँदनी वाली रात्रियों में भोगेंगे।
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