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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 35
रुद्धापाङ्गप्रसरमलकैरञ्जन स्नेहशून्यं प्रत्यादेशादपि च मधुनो विस्मृतभूविलासम् । त्वय्यासन्ने नयनमुपरिस्पन्दि शङ्के मृगाक्ष्या मीनक्षोभाच्चलकुवलयश्रीतुलामेष्यतीति ।॥
बालों से रोकी गयी कोरों की गति वाला, काजल की चिकनाई से रहित और मदिरा के त्याग से भौंहों के विलास को भूला हुआ तुम्हारे समीप आने पर ऊपर के भाग में फड़कने वाला, मृगनयनी का नेत्र मछली की हलचल से यश्चल कमल की शोभा की समानता को प्राप्त करेगा - ऐसी मेरी संभावना है।
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