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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 1
विद्युद्वन्तं ललितवनिताः सेन्द्रचापं सचित्राः सङ्गीताय प्रहतमुरजाः 'स्निग्धगम्भीरघोषम् । अन्तस्तोयं मणिमयभुवस्तुङ्गमभ्रंलिहाग्राः प्रासादास्त्वां तुलयितुमलं यत्र तैस्तैर्विशेषैः ॥
जहाँ (अलकापुरी) में सुन्दर स्त्रियों वाले, चित्रों से युक्त, सङ्गीत के लिए मृदङ्ग बजाये गये, मणिजटित फर्शों वाले, गगनचुम्बी शिखरों वाले भवन बिजली धारण करने वाले, इन्द्रधनुष से युक्त, मधुर व गम्भीर गर्जन वाले, (अपने) अन्दर जल (धारण करने) वाले (और) ऊँचे तुमसे उन-उन गुणों के कारण बराबरी करने में समर्थ (है)।
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