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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 33
सा संन्यस्ताभरणमवला पेशलं धारयन्ती शय्योत्सङ्गे निहितमसकृद् दुःखदुःखेन गात्रम् । त्वामप्यर्स' नवजलमय मोचयिष्यत्यवश्यं प्रायः सर्वो भवति करुणावृत्तिरार्द्रान्तरात्मा ॥
दुर्बल हुई (तथा) आभूषणों का त्याग किये हुये, बार-बार कठिनाई से शय्या पर रक्खे हुए, कोमल शरीर को धारण करने वाली वह (तुम्हारी भाभी) अवश्य ही तुमको भी नये जल के रूप मे आँसुओं को छुड़ा देगी अर्थात् रुला देगी। (क्योंकि) प्रायः कोमल हृदय वाले सभी दयालु स्वभाव के होते हैं।
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