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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 34
जाने सख्यास्तव मयि मनः संभृतस्नेहमस्मादित्यं भूतां प्रथमविरहे तामहं तर्कयामि । वाचालं मां न खलु सुभगं मन्यभावः करोति प्रत्यक्षं ते निखिलमचिराद् भ्रातरुक्तं मया यत् ॥
(मै) तुम्हारी सखी (भाभी) के मन को अपने प्रति स्नेह से भरा हुआ जानता हूँ, इसलिए मैं उसे प्रथम विरह में इस प्रकार (अति दुर्बल) हुई सोचता हूँ, अपने को सौभाग्यशाली समझने का भाव मुझे मुखर नहीं बना रहा है। हे भाई, मैंने जो कुछ कहा है, (वह) शीघ्र ही तुम्हें प्रत्यक्ष (हो जायेगा)।
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