त्वामालिख्य प्रणयकुपिर्ता धातुरागैः शिलायामात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम् ।
असैस्तावन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरालुप्यते मे क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते सङ्गमं नौ कृतान्तः ॥
(हे प्रिय!) प्रणय में रूठी हुई तुमको गेरू के रंग से पत्थर पर चित्रित कर जैसे ही मैं स्वयं को तेरे चरणों में गिरा हुआ बनाना चाहता हूँ, वैसे ही बार-बार उमड़े हुए आँसुओं से मेरी दृष्टि लुप्त हो जाती है। निर्दय दैव, उस (चित्र) में भी हम दोनों के मिलने को नहीं सहता है।
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