मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 45
त्वामालिख्य प्रणयकुपिर्ता धातुरागैः शिलायामात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम् । असैस्तावन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरालुप्यते मे क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते सङ्गमं नौ कृतान्तः ॥
(हे प्रिय!) प्रणय में रूठी हुई तुमको गेरू के रंग से पत्थर पर चित्रित कर जैसे ही मैं स्वयं को तेरे चरणों में गिरा हुआ बनाना चाहता हूँ, वैसे ही बार-बार उमड़े हुए आँसुओं से मेरी दृष्टि लुप्त हो जाती है। निर्दय दैव, उस (चित्र) में भी हम दोनों के मिलने को नहीं सहता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मेघदूतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मेघदूतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें