संक्षिप्येत क्षण इव कर्थ' दीर्घयामा त्रियामाः सर्वावस्थास्वहरपि कथं मन्दमन्दातपं स्यात् ।
इत्थं चेतश्चदुलनयने दुर्लभप्रार्थनं मे गाढोष्माभिः कृतमशरणं त्वद्वियोगव्यथाभिः ॥
लम्बे प्रहरों वाली रात्रि क्षण के समान किस प्रकार छोटी हो जाये और दिन सभी अवस्थाओं में मन्दी-मन्दी धूप वाला कैसे हो? हे चञ्चल नेत्रों वाली! इस प्रकार दुर्लभ अभिलाषा वाले मेरे मन को अतितीव्र ताप वाली तेरे वियोग की पीड़ाओं ने अनाथ बना दिया है।
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