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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 54
कच्चित्सौम्य व्यवसितमिदं बन्धुकृत्यं त्वया मे प्रत्यादेशान्न' खलु भवतो धीरतां कल्पयामि । निःशब्दोऽपि प्रदिशसि जलं याचितश्चातकेभ्यः प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियैव ॥
हे सज्जन! तुमने मुझ मित्र का यह कार्य (करना) निश्चित कर लिया है न? निश्चित ही आपने अस्वीकार नहीं किया, इससे मैं आपके धैर्य की कल्पना कर रहा हूँ। क्योंकि माँगने पर चुपचाप रहकर भी दातकों को जल देते हो। सज्जनों का अभिलषित कार्यों को पूरा करना ही याचकों के लिए उत्तर होता है।
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