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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 29
आधिक्षामां विरहशयने सन्निषष्णैकपाश्र्वां प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशोः । नीता रात्रिः क्षण इव मया सार्थमिच्छारतैर्या तामेवोष्णैर्विरहमहतीमश्रुभिर्यापयन्तीम् ।।
मनोव्यथा से क्षीण हुई विरह की शय्या (सेज) पर टेके हुए एक पार्श्व वाली, मानो पूर्व दिशा के मूल (क्षितिज) में एक कलामात्र अवशिष्ट चन्द्रमा की मूर्ति (तथा), जो रात मेरे साथ इच्छानुसार रमण क्रियाओं के द्वारा एक क्षण के समान व्यतीत की थी, उसे ही वियोग के कारण लम्बी (असहज) हुई को गर्म आँसुओं के द्वारा बिताती हुई (उस पतिव्रता को देखना)।
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