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मेघदूतम् • अध्याय 2 • श्लोक 9
यत्र स्त्रीणां प्रियतमभुजोच्छ्‌वासितालिङ्गित्तानामङ्गग्लानि सुरतजनितां तन्तुजालावलम्बाः । त्वत्संरोधापगमविशदैश्चन्द्रपादैर्निशीथे व्यालुम्पन्ति स्फुटजललवस्यन्दिनश्चन्द्रकान्ताः ॥
जहाँ (अलकापुरी में) अर्द्ध रात्रि में तुम्हारी रुकावट के हट जाने से निर्मल चन्द्रकिरणों (के सम्पर्क) के कारण स्वच्छ जलकण की बूंदों को टपकाने वाली झालरों में लटकती हुई, चन्द्रकान्त मणियाँ प्रियतमों की भुजाओं से ढीले पड़े आलिङ्गनों वाली स्त्रियों की रतिक्रीड़ा से उत्पन्न शारीरिक थकान को दूर करती हैं।
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