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अध्याय 17 — सप्तदशोल्लासः
कुलार्णव
98 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! मैं गुरु नामादि की भावना को सुनना चाहती हूँ। हे परमेश्वर! साथ ही कुल पदार्थों का तत्त्व मुझे बताइए।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने मुझसे पूछा है, उसे कहूंगा। उसके सुनने मात्र से 'कुल का ज्ञान' मिलता है।
हे नाथ, हे भगवन्! आपको नमस्कार है। गुरुरूप में शिव को नमस्कार है, जो परम ज्ञान की सिद्धि के लिए अनेक स्वरूपों को धारण करते हैं, जो नारायण स्वरूप हैं, परमात्म स्वरूप हैं। जो सभी प्रकार के अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करने के लिए सूर्य स्वरूप हैं, चैतन्यमय हैं। जो सर्वज्ञ, दया के मूर्तिमान स्वरूप एवं कल्याणकारी हैं और इस लोक में तथा परलोक में भव्य भक्तों को शुभ भाव प्रदान करते हैं। ऐसे शिवस्वरूप गुरुदेव को मैं आगे से, बगल से, पीछे से, ऊपर से, नीचे से सभी ओर से नमस्कार करता हूँ। सत् चित् रूप से मैं सदा आपकी सेवा में रहूं।
गुरु - 'गु' शब्द का अर्थ है अन्धकार और 'रु' शब्द का तात्पर्य है उसको दूर करने वाले। अर्थात् अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करने के कारण 'गुरु' नाम पड़ा।
गकार सिद्धिदायक और रेफ पाप दाहक कहा गया है। उकार को विष्णु कहा है। इस प्रकार 'गुरु' तीन शक्तियों से युक्त परम आत्मा है ।
गकार ज्ञानसम्पत्ति का बोधक है, रेफ उसे प्रकट करता है और उकार शिव से तादात्म्य कराता है। इस प्रकार 'गुरु' कहा गया है।
गुप्त आगम के अर्थतत्त्व का सन्धान करने से और उसका उद्बोधन करने से तथा रुद्रादि देव स्वरूप होने से 'गुरु' कहा गया है।
शिष्य को ही वह आचारवान् नहीं बनाता, अपितु स्वयं भी वैसा आचरण करता है और संसार में शास्त्रों के अर्थों को चुनकर वह उनका भावार्थ स्पष्ट करता है। अतः उसे आचार्य कहते हैं। समीप में आए स्थावर या जङ्गम जिस किसी को भी जो शिक्षा देता है तथा यम नियम आदि योग का उसे अभ्यास रहता है। इसी से वह 'आचार्य' कहा जाता है।
आत्मभाव को प्रदान करने से और राग द्वेष को दूर करने से तथा ध्यान के द्वारा जिसमें चित्त को एकनिष्ठ किया जाता है, उसे 'आराध्य' कहा जाता है।
देवता का रूप धारण करने से और शिष्यों पर कृपा करने के कारण तथा शिष्यों पर करुणामय स्वभाव रखने से, हे प्रिये! 'देशिक' नाम पड़ता है।
हे प्रिये! स्व (अपने) अन्तःकरण में शान्तिपूर्वक परतत्त्व का चिन्तन करते रहने से और मिथ्या ज्ञान से रहित होने के कारण 'स्वामी' कहा जाता है।
मन के दोषों से परे होने, हेतु बाद (तर्करहित अज्ञान) से दूर रहने, श्वानादि प्राणियों में समदृष्टि रखने से और रमणीय होने से 'महेश्वर' कहा जाता है।
श्री समृद्धि एवं मोक्ष ज्ञान को देने से, नादब्रह्म और आत्मतत्त्व का बोध कराने से, और हे प्रिये! चित्त से अज्ञान को स्थगित (दूर) करने से 'श्रीनाथ' कहा जाता है।
देश काल के अनुकूल होने से, कुलागम में वर्तमान रहने से और संसार के जीवों को अपने वश में रखने से 'देव' कहा जाता है।
भव (संसार) बन्धन को शान्त करने से, टकार अर्थात् इन्दु (चन्द्र) शेखर होने से और रक्षा करने से तथा कमनीय (सुन्दर) होने के कारण 'भट्टारक' कहा जाता है।
आगम और वेदान्त के प्रकृष्ट रूप से गुप्त रहस्यार्य की विवेचना करने से और भुक्ति, मुक्ति को देने से 'प्रभु' कहा जाता है।
हे प्रिये! योनिमुद्रा का अनुसन्धान (=अभ्यास) करने से, मन्त्र वैभव को प्रकट करने से और गीर्वाण (देव) समूह का पूज्य होने से 'योगी' कहा जाता है।
सङ्ग से होने वाले दुःख का त्याग करने से, यत्र कुत्र (जहाँ कही) आश्रम बनाकर रहने से, मिघ अर्थात् गुप्त रूप से अपनी आत्मा का अनुसन्धान (साक्षात्कार) करने से 'संयमी' कहा जाता है।
तत्वरूप का मनन करने से, परिवाद (विवाद) से दूर रहने से और शुभ कार्यों को स्वीकार करने से 'तपस्वी' कहा जाता है।
अक्षर (अविनाशी) होने से, वरेण्य (श्रेष्ठ) होने से, संसार के बन्धनों से धूत (मुक्त) रहने से और 'तत्वमसि' के अर्थ को सिद्ध करने से 'अवधूत' कहा जाता है।
राग (आसक्ति), मद (अहंकार), क्लेश, क्रोध, मात्सर्य, मोह से वीत (रहित) होने से और रज, तम गुणों से दूर रहने के कारण 'वीर' कहा जाता है।
शक्ति और शिव से उद्भूत कुल या गोत्र प्रसिद्ध है, जिससे मोक्ष मिलता है - यह ज्ञान रखने वाला 'कौलिक' कहलाता है। 'अकुल' को शिव कहते हैं और 'कुल' शक्ति को कहा गया है। हे प्रिये! 'कुल' और 'अकुल' के अनुसन्धान में निपुण व्यक्ति ही 'कौलिक' हैं।
सारवस्तु का संग्रह करने से, धर्म, कर्म में लगे रहने से और कारण (इन्द्रिय) समूह का नियमन करने से 'साधक' कहा जाता है।
मन, वाक् (वचन), काय (शरीर) और कर्म से परम भक्तिपूर्वक भजन करने वाला समस्त दुःखों से तर (पार हो) जाता है, इससे वह 'भक्त' कहलाता है।
जो अपने शरीर, अर्थ (धन) और प्राणों को सद्गुरु को अर्पित कर योग की शिक्षा ग्रहण करता है, वह 'शिष्य' कहा जाता है।
योनिमुद्रा का अनुसन्धान करने से, गिरिजा के चरणों की सेवा करने से और उपाधि, वैभवों को निलींन (रहित) करने से 'योगिनी' कहलाती है।
शतकोटि महादिव्य योगिनियों को प्रसन्न करने से और तीव्र मुक्ति प्रदान करने से 'शक्ति' कही जाती है।
हे प्रिये! पालन करने से, दुरितों (पापों) का नाश करने से और कामनाओं की पूर्ति करने से 'पादुका' कहलाती है।
सहस्रों पूर्वजन्मों में किए हुए पापों का नाश करने से और परम देवतत्व का प्रकाश करने से 'जप' कहा जाता है।
स्तोक अर्थात् अल्प ही से मन को अति प्रसन्न करने से एवं हे देवि! स्तोतृ अर्थात् स्तुति (प्रशंसा) द्वारा पार होने से 'स्तोत्र' कहलाता है।
सभी इन्द्रियों के समस्त दुःखों को मन द्वारा संयमित कर अपने अन्तस् (हृदय) में अभीष्ट देवता का चिन्तन करना ही 'ध्यान' कहा जाता है।
हे पार्वति! चरित के रहस्य को प्रकाश करने से, रक्षा करने से और हे प्रिये। नर नारी का स्वरूप होने से 'चरण' कहलाता है।
समस्त शास्त्रार्थ को वेदित (सूचित) करने से, सर्वधर्मार्थ का निरूपण करने से और सभी दर्शनों का प्रमाणस्वरूप होने से 'वेद' कहा जाता है।
पुण्य पापादि का कथन करने से, राक्षस आदि का निवारण करने से और नौ प्रकार की भक्ति आदि का वर्णन करने से 'पुराण' कहा जाता है।
हे देवि! वर्णाश्रम के लोगों का शासन करने से और सब पापों से त्राण (रक्षा) करने से 'शास्त्र' कहलाता है।
निमित्तों का स्मरण करने से, धर्म, अधर्म का निरूपण करने से और हे देवि! अज्ञान तिमिर (अन्धकार) को दूर करने से 'स्मृति' कही जाती है।
इष्ट एवं धर्म आदि का कथन करने से, तिमिर (अज्ञानान्धकार) को नष्ट करने से और सब दुःखों का हरण करने से 'इतिहास' कहा जाता है।
हे प्रिये! आचार का वर्णन करने से, दिव्यगति को प्राप्त करने का विधान बताने से और महान् अर्थतत्त्व का कथन करने से 'आगम' कहलाता है।
शाकिनीगण की पूजा करने से, भवसागर को तरने (पार करने) से और परा आदि शक्ति का सान्निध्य प्राप्त करने से 'शाक्त' कहा जाता है।
कौमार्य आदि का निषेध करने से, लय (मृत्यु) व जन्म आदि का नाश करने से और अशेष कुल (शक्ति) से सम्बद्ध होने से 'कौल' कहलाता है।
हे देवि! पाशों को काटने से, परम तेज को रञ्जित (प्रकाशित) करने से और यतियों द्वारा चिन्ता किये जाने से 'पारम्पर्य' कहा जाता है।
संसार का सारभूत होने से, प्रकाश (ज्ञान) का आनन्द देने से और यश एवं सौभाग्य को देने से 'सम्प्रदाय' कहलाता है।
सब मार्गों का आदि होने से, मन के उल्लास को बढ़ाने से और यज्ञादि रूप से धर्म का हेतुभूत होने से 'आम्नाय' कहा जाता है।
अनेक महामन्त्रों, यन्त्रों, और दैवतों के श्रुत होने (सुनने) से और श्रुति (वेद) से अभिन्न होने से 'श्रौत' कहलाता है।
आम्नायतत्त्व के अनुरूप होने से, चातुर्य (चतुर्वर्ग) के अर्थ का निरूपण करने से और राग द्वेषादि को शान्त करने से 'आचार' कहा जाता है।
दिव्य भाव देने से, पापों का क्षालन (नाश) करने से और भव बन्धन से मुक्त करने से विद्वानों के द्वारा इसे 'दीक्षा' कहा गया है।
अहं भाव को दूर करने से, भयों को दूर करने से, सेचन (सिञ्चन) करने से और कम्पादि आनन्द को उत्पन्न करने से 'अभिषेक' कहलाता है।
उल्वण (अति प्रभावशाली) होने से, परम (श्रेष्ठ) होने से, देवता की प्रीति दिलाने से और शक्तिपात करने से 'उपदेश' कहा जाता है।
देवता के अमित तेज के तत्वरूप का मनन होने से और सभी प्रकार के भयों से त्राण (रक्षक) होने से 'मन्त्र' कहलाता है।
हे पार्वति! भक्तों की देह में विराजमान होने से, वरदान देने से और तापत्रय आदि को शान्त करने से 'देवता' कहा जाता है।
हे देवि! न्याय से उपार्जित धन का शरीर में उपयोग करने से और सब प्रकार की रक्षा करने से 'न्यास' कहलाता है।
हे कुलेश्वरि! देवताओं को मुदित (प्रसन्न) करती हैं और मन को द्रवित (भाव पूर्ण) करती हैं। अतः 'मुद्रा' नाम से प्रसिद्ध है, उन्हें दिखाना चाहिये।
अनन्त फल देने से, समस्त पापों को क्षपित (नष्ट) करने से, मातृकात्मक (मातृकाओं वर्णों से बनी) होने से और लाभकारिणी होने से 'अक्षमालिका' कही जाती है।
हे देवेशि! मङ्गल करने से, डाकिनी योगिनीगण का आश्रय होने से और ललित (सुन्दर) होने से 'मण्डल' कहलाता है।
कमलासनरूप होने से, लघु तत्त्वादि का नाश करने से और अपार पापों को शमित (शान्त) करने से 'कलश' कहा जाता है।
हे कुलेश्वरी! यम एवं भूत आदि सभी भयों से निरन्तर त्राण करता है, अतः 'यन्त्र' कहलाता है।
हे प्रिये! आत्मसिद्धि देने से, सब रोगों को दूर करने से और नव सिद्धियाँ प्रदान करने से इसे 'आसन' कहा गया है।
मायाजाल आदि के बन्धन को शमन करने से, मोक्षमार्ग का निरूपण करने से और आठों प्रकार के दुःखों को दूर करने से 'मध' कहलाता है। महादान के अर्थ का सूचक होने से, यागभूमि का एकमात्र साधन होने से और मेरे (शिव के) भाव को उत्पन्न करने से 'मद्य' कहा जाता है।
हे प्रिये! सुन्दर मन द्वारा सेवित होने से, सदा राज्यदायिनी होने से और सुर (देव) रूप को प्रदान करने से 'सुरा' कहलाती है।
हे प्रिये! अमृतांशु स्वरूप होने से, मृत्यु के भय को दूर करने से और तत्त्व का प्रकाश करने से 'अमृत' कहा जाता है।
हे देवि! संसार में पान करने का अङ्गभूत होने से, त्रि (तीन) और चार कलाओं का आश्रय करने से तथा पतितों का त्राण (उद्धार) करने से 'पात्र' कहलाता है।
आशु (शीघ्र) शुद्ध रूप देने से, धातृदेव (विधाता) को प्रिय होने से और आधेय का रक्षण करने से विद्वानों द्वारा इसे 'आधार' कहा जाता है।
हे देवि! माङ्गल्य (शुभ फल) देने से, सम्बिदानन्द प्रदान करने से और सब देवताओं को प्रिय होने से 'मांस' कहलाता है।
हे प्रिये! पूर्वजन्म के पापों का शमन करने से, जन्म और मृत्यु का निवारण करने से और सभी प्रकार का फल देने से 'पूजा' कही जाती है।
अभीष्ट फल देने से, चतुर्वर्ग के फलों का आश्रय होने से और सब देवताओं का नन्दन (आनन्द) करने से 'अर्चन' कहलाता है।
तत्त्वात्मक देवता को उसके परिवार सहित नवानन्द प्रदान करने से 'तर्पण' कहा जाता है।
गम्भीर पापों, दुर्भाग्य और क्लेश का नाश करने से और धर्म का ज्ञान देने से 'गन्ध' कहलाता है।
आघ्राण (सुगन्धि) को देने से, मोक्षमार्ग को दिखाने से और दग्ध, दुःखादि का दमन करने से 'आमोद' कहा जाता है।
हे कुलेशानि! अन्न के दान से, अशेष (समस्त) पापों को क्षपित (नष्ट) करने से और तादात्म्य करने से हे देवि! 'अक्षत' कहलाते हैं।
पुण्य की वृद्धि करने से, पापों के समूह का परिहार (क्षय) करने से और पुष्कल (अत्यधिक) अर्थ प्रदान करने से से 'पुष्प' कहा जाता है।
बड़े से बड़े समस्त दोषों को धूत (नष्ट) करने से, गन्ध के प्रभाव से पवित्र करने से और परमानन्द को उत्पन्न करने से 'धूप' कहलाता है।
दीर्घ अज्ञान के महान्धकार और अहङ्कार को दूर करने से तथा परतत्व का प्रकाश करने से 'दीप' कहा जाता है।
मोहान्धकार को शान्त करने से, क्षयादि रोग एवं दुःखों को दूर करने से, दिव्य रूप प्रदान करने से और परतत्त्व का प्रकाश करने से 'मोक्षदीप' प्रसिद्ध है, जो मोक्षमार्ग का एकमात्र साधन है।
हे कुलेशानि! छः रसों से युक्त (चोष्य लेह्यादि) चार प्रकार के द्रव्यों को निवेदित करने से तृप्ति होती है। अतः 'नैवेद्य' कहलाता है।
बहु प्रकार से विचरते हुये भूतों के समूह का निवारण करने से और लिप्त पापों के विनाशक होने से 'बलि' कही जाती है।
हे प्रिये! आपकी (देवी की) सेवा करने से तत्वत्रय की शुद्धि होती है और तत्त्व का प्रकाश करने से 'तत्वत्रय' कहलाता है।
हे प्रिये! चतुर्वर्ग के फल को देने से, अज्ञान के बन्धन को लुण्ठित (नष्ट) करने से और कल्याणकारी धर्म का मूल होने से 'चलुक' कहा जाता है।
प्रकाशानन्द को उत्पन्न करने से, सामरस्य (समरसता, ऐक्य भाव) को देने से और परतत्व का दर्शन कराने से 'प्रसाद' कहलाता है।
हे देवि! पाश को काटने से, नरक का निवारण करने से और हे परमेशानि! पावन पवित्र करने से 'पान' कहा जाता है।
कर्म, मन, वचन से और सभी अवस्थाओं में निकट से विधिवत् सेवा करने से 'उपास्ति' कहलाती है।
पञ्चाङ्ग उपासना द्वारा इष्टदेवता की प्रीति देने से जो भक्त के 'पुरः' (आगे) 'चरति' (चलता) है, हे प्रिये! वह 'पुरश्चरण' कहा जाता है।
आवाहन आदि १६ अथवा १२ तक के कर्मों का विधिपूर्वक व्यवहार करना 'उपहार' कहलाता है।
१६ उपचारों से आवृत्ति सहित पूजन कर अपने अपने स्थान को उन देवों का प्रेषण 'मृद्वासन' कहा जाता है।
पूजा के लिये देवता का आह्वान करना (बुलाना) 'आवाहन' कहलाता है। हे कुलनायिके! आसन पर बैठाना 'स्थापन' है।
एक दूसरे को आमने सामने स्थित करना 'सन्निधापन' कहलाता है। जहाँ कहीं अन्य स्थान के लिये न चलना 'सन्त्रिरोधन' है।
देवता के शरीर में षडङ्गों का न्यास करना 'सकली-कृति' है। आच्छादन करना (बँकना) ही 'अवगुण्ठन' है।
हे प्रिये! घेनुमुद्रा को दिखाना 'अमृतीकरण' है। हे देवि ! 'क्षमस्व' कहकर अञ्जलि दिखाना 'परमीकरण' है। हे प्रिये! देवता के सम्मुख कुशल प्रश्न करना 'स्वागत' है।
श्यामाक, दूर्वा, अब्ज और विष्णुक्रान्ता से 'पाद्य' होता है। जाती, लवङ्ग, कक्कोल से 'आचमनीय' कहा है।
अखिल अघों (पापों) को शान्त करने से तथा धन पुत्र की वृद्धि करने से और अनर्घ (पुण्य) फल देने से 'अर्घ्य' कहलाता है।
१. सिद्धार्थ (सरसों), २. अक्षत, ३. कुशाग्र, ४. तिल, ५. यव (जौ), ६. गन्ध (चन्दन), ७. फल और ८. पुष्प से 'अष्टाङ्गार्घ्य' कहा गया है।
हे कुलेश्वरि! १. मधु (शहद), २. आज्य (घी) और ३. दही - इन तीनों से 'मधुपर्क' बनता है। इलायची, चन्दन, कस्तूरी, काला अगरु आदि से सुगन्धित जल द्वारा देह का प्रक्षालन करना 'स्नान' है।
हे प्रिये! अष्टाङ्ग प्रणाम करना 'वन्दन' कहा गया है। यह सारा चराचर संसार 'क्षेत्र' है। उक्त क्षेत्र का जो पालन करता है, वही 'क्षेत्रपाल' है।
इस प्रकार 'गुरु' आदि नामों की भावना मैंने, हे महेशानि! संक्षेप में आपसे कही। जो इसे जानता है, वह कुलपूजक कौलिक है। हे महेश्वरि! रहस्य से भी अति रहस्यपूर्ण यह ऊर्ध्वाम्नाय संक्षेप में कहा गया है, विस्तार से नहीं।
योगिनियों के हृदय में स्थित यह कुलार्णव शास्त्र सबका सार है। मेरे द्वारा आज इसे प्रकट किया गया। अतः इसे यत्न करके गुप्त रखे।
हे महेशानि! पुस्तक को पशु (अधार्मिक) के घर में न छोड़े। न तो पशु के हाथ में इसे दे और न पशु के सामने इसे पढ़े। आसवोल्लास को पढ़े नहीं और पुस्तक को भूमि पर न रखे।
नित्य भक्ति से इसकी पूजा करे और गुरुमुख से इसका ज्ञान प्राप्त करे। अयोग्य पुत्र या अयोग्य शिष्य (या अदीक्षित) को इसे कभी न दे। स्नेह, लोभ या भय से जो इसे बताता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
हे देवि! प्राज्ञ अर्थात् प्रकृष्टरूप से ज्ञान रखने वाले को जो-जो बातें जाननी चाहिये, उनका कुछ वर्णन मैंने भुक्ति मुक्ति रूपी फल के इच्छुक साधकों के हित के लिये किया है।
श्री चक्र के निकट जो ऊर्ध्वाम्नाय के माहात्म्य का अत्यन्त भक्तिपूर्वक पाठ करता है या उसे श्रवण करता है, वही 'कौलिक' है। व्रत, स्नान, तप, तीर्थ यज्ञ, देवार्चन आदि से जो पुण्यफल मिलता है, उसका कोटि गुना फल उक्त माहात्म्य से प्राप्त होता है, वह कौलिक आपके (देवी के) सान्निध्य में निवास करता है, इसमें सन्देह नहीं।
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