यावदिन्द्रियसन्तापं मनसा संनियम्य च ।
स्वान्तेनाभीष्टदेवस्य चिन्तनं ध्यानमुच्यते ॥
सभी इन्द्रियों के समस्त दुःखों को मन द्वारा संयमित कर अपने अन्तस् (हृदय) में अभीष्ट देवता का चिन्तन करना ही 'ध्यान' कहा जाता है।
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