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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 87
दर्शनं धेनुमुद्राया अमृतीकरणं प्रिये । क्षमस्वेत्यञ्जलिर्देवि परमीकरणं प्रिये । स्वागतं कुशलप्रश्नं निगदेद्देवताग्रतः ॥
हे प्रिये! घेनुमुद्रा को दिखाना 'अमृतीकरण' है। हे देवि ! 'क्षमस्व' कहकर अञ्जलि दिखाना 'परमीकरण' है। हे प्रिये! देवता के सम्मुख कुशल प्रश्न करना 'स्वागत' है।
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