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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 98
यश्चोर्ध्वाम्नायमाहात्म्यं पठेत् श्रीचक्रसन्निधौ ॥ भक्त्या परमया देवि यः शृणोति स कौलिकः । व्रतं स्नानं तपस्तीर्थं यज्ञदेवार्चनादिषु ॥ तत् फलं कोटिगुणितं लभते नात्र संशयः । त्वत्सन्निधौ सन्निवसेन्नात्र कार्या विचारणा ॥
श्री चक्र के निकट जो ऊर्ध्वाम्नाय के माहात्म्य का अत्यन्त भक्तिपूर्वक पाठ करता है या उसे श्रवण करता है, वही 'कौलिक' है। व्रत, स्नान, तप, तीर्थ यज्ञ, देवार्चन आदि से जो पुण्यफल मिलता है, उसका कोटि गुना फल उक्त माहात्म्य से प्राप्त होता है, वह कौलिक आपके (देवी के) सान्निध्य में निवास करता है, इसमें सन्देह नहीं।
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