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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 20
अक्षरत्वाद्वरेण्यत्वाद्यूतसंसारबन्धनात् । तत्त्वमस्यर्थसिद्धत्वात् अवधूतोऽभिधीयते ॥
अक्षर (अविनाशी) होने से, वरेण्य (श्रेष्ठ) होने से, संसार के बन्धनों से धूत (मुक्त) रहने से और 'तत्वमसि' के अर्थ को सिद्ध करने से 'अवधूत' कहा जाता है।
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