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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 85
अन्योन्यसम्मुखाकारः सन्निधापनमीरितम् । यत्र कुत्राप्यचलनं सन्निरोधनमीरितम् ॥
एक दूसरे को आमने सामने स्थित करना 'सन्निधापन' कहलाता है। जहाँ कहीं अन्य स्थान के लिये न चलना 'सन्त्रिरोधन' है।
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