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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 97
देवि यद्विद्यते प्राज्ञे तत्तत् किश्चिन्मयोदितम् ॥ साधकानां हितार्थाय भुक्तिमुक्तिफलेषिणाम् ।
हे देवि! प्राज्ञ अर्थात् प्रकृष्टरूप से ज्ञान रखने वाले को जो-जो बातें जाननी चाहिये, उनका कुछ वर्णन मैंने भुक्ति मुक्ति रूपी फल के इच्छुक साधकों के हित के लिये किया है।
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