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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 92
अष्टाङ्गप्रणिपातन्तु कथितं वन्दनं प्रिये ॥ एतच्चराचरं सर्वं क्षेत्रमित्यभिधीयते । तत् क्षेत्रं पालितं येन क्षेत्रपालः स उच्यते ॥
हे प्रिये! अष्टाङ्ग प्रणाम करना 'वन्दन' कहा गया है। यह सारा चराचर संसार 'क्षेत्र' है। उक्त क्षेत्र का जो पालन करता है, वही 'क्षेत्रपाल' है।
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