प्रकाशानन्दजननात् सामरस्थप्रदानतः ।
दर्शनात् परतत्त्वस्य प्रसाद इति कथ्यते ॥
प्रकाशानन्द को उत्पन्न करने से, सामरस्य (समरसता, ऐक्य भाव) को देने से और परतत्व का दर्शन कराने से 'प्रसाद' कहलाता है।
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