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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 3
नमस्ते नाथ भगवन् शिवाय गुरुरूपिणे । विद्यावतारसंसिद्ध्यै स्वीकृतानेकविग्रह ॥ नारायणस्वरूपाय परमात्मस्वरूपिणे । सर्वाज्ञानतमोभेदभानवे चैतन्याय च ॥ सर्वज्ञाय दयाक्लृप्तविग्रहाय शिवात्मने । परत्रेह च भक्तानां भव्यानां भावदायिने ॥ पुरस्तात् पार्श्वयोः पृष्ठे नमः कुर्यामुपर्यधः । सदा सच्चित्तरूपेण विधेहि तव दासताम् ॥
हे नाथ, हे भगवन्! आपको नमस्कार है। गुरुरूप में शिव को नमस्कार है, जो परम ज्ञान की सिद्धि के लिए अनेक स्वरूपों को धारण करते हैं, जो नारायण स्वरूप हैं, परमात्म स्वरूप हैं। जो सभी प्रकार के अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करने के लिए सूर्य स्वरूप हैं, चैतन्यमय हैं। जो सर्वज्ञ, दया के मूर्तिमान स्वरूप एवं कल्याणकारी हैं और इस लोक में तथा परलोक में भव्य भक्तों को शुभ भाव प्रदान करते हैं। ऐसे शिवस्वरूप गुरुदेव को मैं आगे से, बगल से, पीछे से, ऊपर से, नीचे से सभी ओर से नमस्कार करता हूँ। सत् चित् रूप से मैं सदा आपकी सेवा में रहूं।
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