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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 24
भजनात् परया भक्त्या मनोवाक्कायकर्मभिः । तरत्यखिलदुःखानि तस्माद्भक्त इतीरितः ॥
मन, वाक् (वचन), काय (शरीर) और कर्म से परम भक्तिपूर्वक भजन करने वाला समस्त दुःखों से तर (पार हो) जाता है, इससे वह 'भक्त' कहलाता है।
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