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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 12
मनोदोषादिदूरत्वाद्धेतुवादादिवर्जनात् । श्वादिप्राणिषु सादृश्याद् रम्यत्वाच्च महेश्वरः ॥
मन के दोषों से परे होने, हेतु बाद (तर्करहित अज्ञान) से दूर रहने, श्वानादि प्राणियों में समदृष्टि रखने से और रमणीय होने से 'महेश्वर' कहा जाता है।
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